विरह व्यथा से व्यतीत द्रवित हो, वन वन भटके राम

आश्रम देखि जानकी हीना, भए बिकल जस प्राकृत दीना।।

विरह व्यथा से व्यतीत द्रवित हो, वन वन भटके राम-२।
अपनी सिया को, प्राण पिया को, पग पग ढूंढे राम।
विरह व्यथा से व्यतीत द्रवित हो……

कुंजन माहि न सरिता तीरे, विरह विकल रघुवीर अधीरे।
हे खग मृग हे मधुकर शैनी, तुम देखी सीता मृग नयनी।
वृक्ष लता से, जा से ता से, पूछत डोले राम।
विरह व्यथा से व्यतीत द्रवित हो……

फागुन खानी जानकी सीता, रूप शील व्रत नाम पुनीता।
प्राणाधिका घनिष्ट सनेही, कबहु ना दूर भई वैदेही।
श्री हरि जू श्री हीन सिया विन, ऐसे लागे राम।

विरह व्यथा से व्यतीत द्रवित हो, वन वन भटके राम-२।
अपनी सिया को, प्राण पिया को, पग पग ढूंढे राम।
विरह व्यथा से व्यतीत द्रवित हो……

 

रचना और संगीत: रवीन्द्र जैन
स्वर: मोहम्मद अज़ीज
प्रस्तुतकर्ता: रामानंद सागर

Scroll to Top
Open chat
%d bloggers like this: